Sunday, 5 April 2015

तुम थी या नहीं!

तुम थी, या नहीं ? या था कुछ और?
अत्यंत गंभीर, गहरा सा,
जैसे बच्चे की नींद, या माँ की लोरी,
जाड़ो की नरम धुप सी,
गर्म रातों में ठंडी पुरवाइयों सी,
सुकून की नींद सी,
तुम आई थी, मुक्त करने मुझे जीवन की चिन्ताओं से,
तुम दे गई मुझे सभ कुछ,
पर मैं तुम्हें क्या दूं, तुम्हारे ज़िक्र के सिवाए?

तुम्हे पुकारूँ भी तोह कैसे, किस ओर आवाज़ दूं?
जब ख़ामोशी से ही सुन लेती हो सभ कुछ, और तर कर देती हो मुझे प्रेम से,
मैं सोया था, या था जगा हुआ?

तुम हकीकत में थी, या आई थी मेरे सपनो की हकीकत बन कर?
वो तुम थी, या तुम थी ही नहीं,
तुम मेरा वेहम नहीं हो सकती,
मन मानता ही नहीं, कि तुम थी ही नहीं,
हाँ तुम थी, था नहीं कुछ और,
वो तुम ही थी, तुम मेरे जीवन की डोर।।

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