Sunday, 15 February 2015

मैंने इंसान बदलते देखा है


मौसमो को बदलते देखा है,
धूप से छाँव , छाँव से धूप होते देखा है,
सूरज की पहली किरण से लेकर,
चाँद की चांदनी तक, अँधेरा होते देखा है।
बदलना फितरत है इनकी,
कभी न खुद को ग़म करते देखा है॥

लेकिन जब देखा, इंसान को बदलते हुए,
तब अपनी आँखों से आंसू को गिरते देखा है।

वक़्त बदलते देखा है,
औदे, हुकूमत, सियासत और पोशाख बदलते देखा है,
और मैंने, नज़रे, फितरत और इंसान को भी बदलते देखा है॥

जो कहते थे अपने है, उनको भी बदलते देखा है, और जो न थे कभी मेरे,
मैंने उनको भी बदलते देखा है, मैंने इंसान बदलते देखा है॥

निदा सैफी